HINDI POEM ''एक ही धरातल''
एक ही धरातल ------------- पट जाती हमारे बीच की खाई यदि , मिल जाता निश्चित् आवरण तुम्हारे जैसा वातावरण . ढल जाती मैं भी उसी साँचे में जिसमें तुम ढले हो . भिन्नता तनिक न रहती हममें यदि मैं भी पल , बढ़ जाती उसी समाज में जिसमें तुम पले हो . तुम कैसे ये निर्णय कर लेते हो कि , तुम हर क्षेत्र में आगे हो मुझसे ? किस घमण्ड में तुम निकल जाते हो मेरे सामने से सीना फैलाकर , तुच्छ दृष्टिपात कर , नाक , भौंह सिकोड़कर और गर्व से सिर उठाकर ? क्या यह आधुनिकता ही दर्पण है सभ्य समाज का ! क्या सारा समय ही है तुम्हारा आज का ? मेरा तनिक भी नहीं ! तुम ये क्यों सोचते हो - प्रत्यक्ष तुम्हारे मैं लघु बन जाऊँगी या , मन में अपने हीन भावना लाऊँगी मैं तो प्रत्यक्ष प्रभु के सौ - सौ बार बस , सादा जी...