HINDI POEM ''कितनी बार''
कितनी बार
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मैं कब न थी प्रस्तुत,
कब नहीं मैंने किसी का साथ निभाया?
मैंने तो
ओ मेरे स्थिर प्रेम!
जिया है जीवन के सत्य को
क्षण-क्षण जीकर.
अपने जीवन के पथ की अनुभूतियों से
मैंने देखी है:
स्नेह की वह तुंग सोपान
जिसमें चढ़कर दर्शन होते हैं
स्वर्ग के,
जहाँ से कोई गिरता नहीं
ऊँचा, ऊँचा और ऊँचा उठता ही जाता है
मगर मेरे प्यार!
मैंने देखा है :
उस उदात्त सोपान से
गिरते हुए बहुतों को.
मैंने देखा है : सागर का विस्तार
अनुभूत की है :
विपुल शांति, भय और अकेलापन
यह वही सागर है
जो प्रातः काल में सूर्य का प्यार पाकर
उसके रंगों में रंग जाता है
मगर जब बाँटता है भास्कर
अपनी विशुद्ध प्रीति की रश्मियों को
तो यही महासागर
विशाल सागर
संध्या-वेला में उसे खा जाता है.
यह भूलवश की गयी गलती नहीं है
यह तो मैं देखती आ रही हूँ वर्षों से
वर्षों से यही होता आया है
कितने ही उत्साहित प्रेमी देखे हैं मैंने -
खिलते सूरज-कुसुम का
मकरंद लेते हुए
और कितने ही निरीह,
सूरज की शव-यात्रा देखते हुए.
जब-जब देखती हूँ मैं इन प्रेमियों को
तब-तब मैं सोचती हूँ -
यह सूरज का पुष्प जो खिला है,
मुरझायेगा
पुनः खिलेगा
क्या यह यूँ ही मुसकराता नहीं रह सकता?
मगर, ओ मेरे साथी !
मैं ये क्यों भूल जाती हूँ कि
तब संध्या के सौष्ठव की
अनुभूति कैसे होगी मुझे ?
तब कैसे उभरेंगे वो भाव हृदय में
जिनसे मुझे होती है
असीम सुख की अनुभूति ?
और मैं इसे बाँट लेती हूँ सबको
तुमको भी मेरे माँझी.
ओ मेरे प्रिय प्राण !
एक तुम ही तो हो
जिससे मिल सका मुझे
स्थिर प्यार
नहीं तो
कितने ही यात्री चढ़े मुझमें
न जाने कितनी, कितनी बार.
Copyright © सतीश रावत
01/03/2001
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