गढ़वाली भाषा से हिंदी भाषा में अनूदित कहानियां

"युगवाणी" हिन्दी मासिक पत्रिका के जुलाई, 2004 के अंक में प्रकाशित, सतीश रावत की गढ़वाली कहानी "बुढड़ि आँख्यूं कि खुद" का सतीश रावत द्वारा हिंदी रूपांतरण.

मूल कहानी : "बुढड़ि आँख्यूं कि खुद"
भाषा : गढ़वाली
लेखक : सतीश रावत
हिंदी रूपांतरण : सतीश रावत 


बूढ़ी आंखों की याद
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ऊंचे-ऊंचे पर्वत कोहरे से ढके हुए हैं.  ऐसा लग रहा है जैसे स्वर्ग धरती पर आ गया हो.  ये बरसाती बादल कभी पूरी धरती को ढक देते हैं, कभी टूटी माला के दानों जैसे इधर-उधर बिखर जाते हैं और कभी स्वर्ग में उड़कर बरसने लगते हैं. 

ये बादल जितनी ऊंचाई में रहते हैं, उतने ही ऊंचे इनके विचार भी रहते हैं.  साल में एक ही  महीना तो आता है इनका.   सावन का महीना.   यादों का महीना.  इस महीने भी ये अपनी नहीं सोचते,  दूसरों के लिए बरसते रहते हैं.  ये हमारी धरती के साथ-साथ  हमारे हृदयों को भी हरा-भरा  बना देते हैं.   ये यादों के बादल अपने-परायों की याद दिला देते हैं.   बच्चों को अपने खेलों की याद आने लगती है, युवाओं को अपने दोस्तों की याद सताने लगती है, बहू-बेटियों को अपने मायके की याद आती है और बुजुर्ग लोग अपने पुराने दिनों को याद करके  भावुक हो जाते हैं.

रिमझिम बरसा हो रही है.  कोहरा अब पहाड़ों की चोटियों में पहुंच गया है.  धूप के दर्शन तो दो-तीन दिनों से हुए भी नहीं हैं.   लोग अपने-अपने घरों में बैठे में बैठे हैं.  कुछ लोग टाइम पास करने के बहाने एक दूसरे के घरों में बैठे हैं.   बातें कर रहे हैं.   *खाजा-बुखणा और *भट्ट चबा रहे हैं. 

पधनि ताई खाजा-बुखणा और भट्ट कहां से खाएगी,  और कैसे खाएगी!   बहू-बेटे, पोते-पोतियां  साथ में होते तो उनके साथ कुछ चख भी लेती.  अकेले नहीं खाया जाता.  *ढबड़ि रोटी और *झंगुर्याळ खा-खा कर उसको उसको इसकी आदत-सी पड़ गई है. 

पधनि ताई चूल्हे के सामने अकेली बैठी है.   चूल्हे में लकड़ियां जल रही हैं.  धुआं एक छोटी सी खिड़की और दरवाजे के रास्ते बाहर निकल रहा है.   लेकिन पधनि ताई इस धुंए की भांति बाहर नहीं आ पा रही है.  बाहर देखने में भी उसकी बूढ़ी आंखों में, यह यादों का मौसम आंसू निकाल देता है. 

पधनि ताई चूल्हे से सटी दीवार पर अपनी कमर टिकाकर अपने पुराने समय को याद करने लगी.  सोचते-सोचते उसको नींद आ गयी.   वो वहीं पर एक बोरे के टुकड़े में घुटने मोड़कर सो गयी.  तभी आकाश की गड़गड़ाहट से उसकी नींद खुल गयी.  उसको ऐसा लगा कि जैसे आकाश बोल रहा हो कि, "हे पधनि !  तू अकेली नहीं है.   तेरे साथ मैं भी हूं, तेरे साथ बात करने वाला कोई नहीं है तो, आ मेरे साथ बात कर."

पधनि ताई  उठी.  उसने देखा कि आग भी बुझ गई थी.   कुछ अंगारे रह गए थे.  उसने हुक्का तैयार किया और पीने लगी.  जब वो सांस  खींचती तो हुक्का गुड़-गुड़-गुड़-गुड़ की आवाज  करने लगता, और जब हुक्का गुड़गुड़ाना बंद करता तो ताई का खप-खप-खप-खप खांसना शुरू हो जाता.  कभी-कभी तो यह निर्दयी हुक्का उसके आंसू तक निकाल देता था.  ताई इसको भी उतना ही प्यार करती थी,  जितना कि अपने अपने बच्चों को.  यह नारियल का हुक्का ताई की जिंदगी का एक जरूरी अंग बन गया था.  किसी जमाने में ताऊजी और ताई इस हुक्के को साथ बैठकर पीते थे.  इस हुक्के से ताई की पुरानी यादें जुड़ी हुई हैं.   यह हुक्का ताई की भाषा (खांसने की आवाज) और ताई इसकी भाषा (हुक्के की आवाज) समझते थे. ऐसा लगता था कि दोनों आपस में बातें कर रहे हों. 

आज ताई के मन में बहुत उथल-पुथल मची हुई थी.   मन में अनेक विचार आ रहे थे और पुरानी यादें ताजा हो रही थीं.  उसका मन कर रहा था कि आज जी भरकर रो लूं और मन हल्का कर  दूं.  यह सोचकर पधनि ताई हुक्का लेकर देहरी  में बैठ गयी.  बाहर रिमझिम बरसात हो रही थी.   आंगन में पानी रुक गया था.   बारिश की बूंदे पानी को कंपा रही थीं,  पर उससे ज्यादा ताई का दिल कांप रहा था. 

ताई को याद आने लगा कि अपने बचपन में वह ऐसे ही पानी में,  अपने साथियों के साथ कागज की बनी नाव चलाती थी और रुके हुए पानी में छपाक-छपाक करके उछलती थी.  अपनी जवानी में जब वह जंगलों में घास के लिए जाती थी, तब यह बारिश उसके तन-मन को भिगाकर कितना सुख देती थी!  पर आज इस बारिश को देखकर डर लगता है.  न जाने कब बहुत बड़ी बाढ़ लेकर आ जाए और परिवार के सभी लोगों को बहाकर केवल बूढ़े लोगों को छोड़ जाए. 

बादल हवा के साथ इधर-उधर उड़ रहे थे.   ताई सोचने लगी कि, " ये बादल भी कितने पागल हैं, जोकि हवा के सहारे पर हैं.  हवा के साथ इधर-उधर बिना सोच-समझकर बह रहे हैं.    हे बादलों ! अभी तुम में ताकत है, जवानी है, इसलिए यह हवा तुम्हारा साथ दे रही है, पर जब तुम में ताकत नहीं रहेगी, जवानी नहीं रहेगी तो तुमने दूर आकाश में अटका रह जाना है जाना है,  मुझे जैसे.  इसलिए किसी के भरोसे मत रहो! अपना सहारा अपने आप बनो.  आज अपना ही खून साथ नहीं देता तो  परायों का क्या भरोसा!"

दूर खड़े पहाड़ ताई की प्यासी आंखों को देख रहे हैं और सोच रहे हैं कि कितनी महान है ये आंखें जो कि प्यासी हैं,  लेकिन फिर भी बरस रही हैं.  पधनि ताई, जिसके अंग-अंग में पहाड़ की संस्कृति बसी हुई है, समझ गई कि पहाड़ क्या सोच रहे हैं.  वह पहाड़ों से बातें करने लगी—" हे पर्वतों!  तुम तो जन्म-जन्मों से महान हो.  तुमने समय-असमय हमारी रक्षा की है.  तुम्हारे मोह-माया और पवित्र प्यार को हम कभी नहीं भुला सकते.  तुम आज भी अपनी जगह पर शान से खड़े हो.   मेरे पहाड़ों!  तुम जीत गए, पर हम जीत कर भी हार गए.   हमने तुमको तुम्हारा प्यार भी नहीं लौटा सका.  पर मुझे विश्वास है कि एक दिन तुम्हारे खून को तुम्हारी याद जरूर आएगी.  आखिर मां के चरणों को छोड़कर जाएंगे कहां!"

नदी का मटमैला पानी धीरे-धीरे बढ़ रहा है.  उसके बढ़ने के साथ-साथ नदी की आवाज भी बढ़ रही है.  पधनि ताई का ध्यान अब नदी की बाढ़ की तरफ चला गया—" किसी बेचारे ने सच ही कहा है कि पहाड़ का पानी और पूत कभी उसके काम नहीं आया.  हे सहेली नदी! जब मैं ही अपने बच्चों को नहीं रोक सकी तो तू किस तरह इस पानी को रोकेगी, जो बहाकर ले जा रहा है सोने जैसी मिट्टी और अनेक अनमोल रत्न?  अब मुझको ही देख ले,  चार लड़कों की माँ हूं, दो अमेरिका और दो दिल्ली में रहते हैं, लेकिन सिर्फ बोलने के लिए ही चार हैं. आज तू मेरी हालत देख ही रही होगी." 

आज पधनि ताई को बहुत दोस्त मिल गए हैं.  आज उसको जीवन में ऐसा लगा कि वह अकेली नहीं है. उसके साथ तो हुक्का, चूल्हा, आग, धुआं, आंगन, पहाड़, बारिश, हवा, आकाश, बादल सारे हैं.  सारी प्रकृति ही उसके साथ है.  उसने औरों के साथ भी बात करने की कोशिश की, लेकिन आंखें जवाब देने लगीं.  अंधेरा होने लगा.  झींगुर आवाज करने लगे.  मेंढक टर्राने लगे. 

Copyright © सतीश रावत
रूपांतरण : सतीश रावत
23/05/2020


* खाजा - गेंहू, भुट्टा, सोयाबीन तथा दालों को भिगाकर, उबालकर, छौंक मारकर, भूनकर खाया जाने वाला पकवान.

* बुखणा - चावल को भिगाकर, भूनकर गुड़ के पानी के साथ बनाया जाने वाला पकवान.

*भट्ट - सोयाबीन की एक प्रजाति.

* ढबड़ि रोटी - मंडुए के आटे के साथ गेंहू के आटे को मिलाकर बनाए जाने वाली रोटी.

* झंगुर्याळ - चावल की तरह पकाकर खाया जाने वाला,  बारीक गोल दानों वाला अनाज.

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