GARHWALI POEM -7- ''खड़्यंजौं कु बाटु'', 11/08/2016
खड़्यंजौं कु
बाटु
------------------जाँदु छा मि यूँ बाटौं मs
झणि कित्गा बार सम्भळ्यूँ छ यूँ बाटौं कु मेथै
कई बार बचा यूँन मेथै लमड़ण से
आज कख हर्चि होलु
वु खड़्यंजौं कु बाटु ?
मि जाण चाणू छौं वेमा बेफिकर ह्वेकि,
अपणि मस्ति मs कुछ गीत गुनगुनै की,
एक लपाग इना अर् एक लपाग उना धैरि की,
कखिम उत्डे़-उत्डे़ की,
कखिम आँखा बूजि की,
कखिम मठु-मठु अर्
कखिम भागि-भागि की ;
पर क्य करण !
मि इन नि कैर सकदू
यूँ चिफळा सीमेंटेड रस्तों मs
मि इन नि जै सकदू.
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सतीश रावत
11/08/2016
11/08/2016

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