HINDI POEM ''मखमली दूब''


मखमली दूब 

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मेरे वरेण्य !

मैं अनभिज्ञ हूँ तुम्हारे रूप से 

तुम्हें देखता हूँ प्रत्यक्ष 

पर मैं मूढ़ समझ नहीं पाता हूँ 

तुम्हारा विस्तृत रूप 

देखकर भी

देख नहीं पाता तुम्हें 

सिर्फ़ अनुभूति होती है तुम्हारी.

 

मेरे हृदय के स्पन्दन !

मैं तुम्हारा आकार समझने में सक्षम नहीं हूँ तो क्या ?

तुम्हें देखता तो हूँ ,

तुम्हें महसूस करता तो हूँ 

तुम्हारी अनुभूति से सुख पाता तो हूँ.

 

मेरे प्रभु !

मैं परिचित हूँ तुम्हारी अथाह शक्ति से 

मुझे आशीष दो कि 

मैं भी उस दूब की तरह बनूँ 

जो अपनी कोमल कोंपलों से 

चीर देती है धरती का सीना 

और काली कठोर कोलतार वाली सड़क से भी 

जो जीत जाती है 

और उसका सीना फाड़कर 

निकल आती है ऊपर 

मुसकराती हुई,

जो बार-बार दबकर भी पैरों के तले 

निराश नहीं होती

अपमानित नहीं होती

अपना अस्तित्व खो नहीं देती 

बल्कि उठा लेती है अपना शीश स्फोट से.

 

वह बहुत बड़ी नहीं होती 

और ना ही छूना चाहती है आकाश 

वह तो चिपकी रहती है 

वसुन्धरा के आधार से 

वह नीची है बहुत नीची 

पर उसके भाव,

उसके विचार,

उसकी भावनाएं 

अमित उदात्त हैं 

वह खुश है अपने स्थान पर 

क्योंकि वह जानती है कि 

तुम ऊपर ही नहीं 

नीचे भी हो 

नीचे, नीचे बहुत नीचे भी हो 

सर्वत्र हो.

 

मेरी आत्मा !

मैं जानता हूँ 

उसने कभी अभिमान किया 

वह बढ़ी और बड़ी भी हुयी 

मगर उसके हर कदम ने 

पकड़ के रखा पृथ्वी को 

उसके दुबले-पतले शरीर की 

हरी-हरी लघु पत्तियों ने भी 

सदा झुका रहना ही सीखा है 

कोमल और नम्र रहना ही सीखा है 

तभी तो,

तभी तो मेरे भगवान !

नहीं खायी कभी उसने मात 

कभी पराजित नहीं हुई 

सदा-सदा ही विजय,

उसके पाँव चूमकर कृत-कृत्य हुई है.

 

मैं जब भी मिला हूँ उससे 

वह मिली 

रोज मिली, हरी-हरी मखमली मुस्कान के साथ.

 

ये जो तुंग वृक्ष हैं 

और इनके आधार पर यह पड़ी है 

मगर मैंने देखी है इसमे

उन वृक्षों से भी अधिक ऊँचाई 

क्योंकि इसके मन में कभी 

उनके साथ रहकर भी 

हीन भावना नहीं आयी 

सच कहूँ मेरे सृजन-शील !

मैंने इसकी छवि में 

देखा है तुम्हें 

जिससे मुझे होती है 

असीम सुखानुभूति 

और मेरे मानस-पटल पर 

उभर आता है बिम्ब तुम्हारा 

और मैं उस छोटी-सी दूर्वा में 

दर्शन कर लेता हूँ 

तुम्हारे !

 

Copyright © सतीश रावत 

02/03/2001

 

 




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