HINDI POEM ''पुरानी नाव '' BY SATISH RAWAT
पुरानी नाव
---------मैंने अपनी
पुरानी छोटी-सी नौका
जब उतारी सागर में
तो मैंने तट से समुद्र-विस्तार देखकर सोचा -
मैं कर लूँगा इसे पार अवश्य ही
पर , मैंने केवल उतना सोचा
जितना देखा था प्रत्यक्ष
और सागर की लहरों के संग
चला गया दूर-दूर बहुत दूर तक
और चलता ही रहा, चलता ही रहा
मेरे सामने से गुजरे
कई जाहज आधुनिक सुविधाओं से युक्त
देनी चाही उन्होंने मुझे सहायता
पर मैंने नहीं ली
चलाता रहा अपनी पुरानी नाव को
जब मैंने देखा
विस्तृत सागर का वास्तविक रूप
वो हरा , काला , लाल और नीला पानी
पानी, पानी केवल पानी
मैं थक गया
और उदास आँखों से देखा
बार-बार अपनी नाव को
पुरानी नाव को
देखता ही रहा
सोचता ही रहा
और मेरी पुरानी नाव
सागर की उर्मियों के संग
जाने कहाँ खो गयी.
Copyright © सतीश
रावत
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