HINDI POEM ''हृदय की पीड़ा'' BY SATISH RAWAT
हृदय की पीड़ा
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मेरे बन्धुओं !
तुम तर गये
भव-सागर को
छोड़ के अपनी
छाप, स्मृति,
और महान् कृति.
तुमने पत्थरों को तराश
कर
आकार जो दिया
था
सजीव किया था
अथाह परिश्रम, लगन, कुशलता
और
उदात्त भावनाओं से.
तुमने परवाह न की
अपने अमूल्य समय की,
जिन्दगी की
और एक अमर-कृति विश्व
को दी
कितने श्रेष्ठ थे
तुम और तुम्हारी
कृति
कितनी ऊँची थीं
तुम्हारी भावनाएं
जो तुमने कठोर पत्थर
पर ली थीं
उतार
हे वरेण्य आत्मा !
तुझे मेरा नमस्कार
बार-बार.
जब तुम्हारे साकार पत्थरों
को
पूजा गया,
संग्रहालयों
में सजाया गया
या
ससम्मान स्थापित किया गया
तब तुम्हें कितनी शांति
की अनुभूति हुई
होगी !
और आज जब
तुम देख रहे
हो
अपने परिश्रम, लगन, प्यार
और
भावनाओं का खण्डन
तो आहत होकर
अश्रु क्यों बहाते
हो ?
क्यों निकाल के रख
नहीं देते
कलेजा इनके सामने
?
जरा दिखाओ इन्हें भी
उसकी तड़पन.
Copyright © सतीश
रावत
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