HINDI POEM ''यादें''
यादें
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दाना-पानी की
खोज में
एक मैना भटकती
जाती है
फिर भी तृण-तृण चुनकर
वह
सुन्दर-सा घर
बनाती है
पर अपने लिए
नहीं
अपने एक अंश
के लिए.
अण्डों से जब
खिल जाते हैं
कोमल-से चीं-चीं, चूँ-चूँ करते
बच्चे
तो खुद भूखी
रहकर
उनको आहार खिलाती
है
जीना उनको सिखलाती
है
चलना उनको सिखलाती
है
एक दिशा नयी
दिखलाती है
अन्तर में चाहे
अवषाद अमित हो
पर गीत खुशी
के गाती है
बच्चों को तब
अपनी
माँ बहुत भाती
है.
पर, पर निकलने
पर जब बच्चे
सब छोड़-छाड़
उड़ जाते हैं
आकाश की अन्नत
ऊँचाई में
तो वह माँ
अनन्त आकाश में
अपने त्याग का प्रतिफल
ढूँढ़ती रह जाती
है
और अम्बर को ताकती
उसकी निर्निमेष आँखें
एक व्यथित कथा कह
जाती हैं
और उसके पास
बस कुछ यादें
यादें ही रह
पाती हैं.
Copyright © सतीश
रावत
25/08/2001
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