एक ही चश्मा (गढ़वळि कविता)



एक ही चश्मा

जीवन-द्वी सच—उज्यळु, अंध्यरु,
अलग नि छन,
द्विया ही जीवन.
जीवन क्य ज्याई?
यूं तैं ही त जिंद्वां हम,
हासिल क्य पाई?
अगना-पिछना यूंका
जीवन खप ग्याई. 

तीन दगड़्या—उज्यळु, अंध्यरु अर मनखि,
जीवन—यूंकु दगड़ु.
अफु खुण पसंद करद मनखि उज्यळु, 
हैंकौं खुण अंध्यरु.
चमकाणू रांद उज्यळु अंध्यरऽ तैं.
अंध्यरु मुंज्याणू रांद म्वासा का कुसिनऽ नऽ
मनखि कि मुखड़ि,
अफु पर लगी नौण देखि कि
खुश होणू रांद मनखि. 

ज्यूंदा छन अज्यूं भि कई अंध्यरा
जु बेर-अबेर लगाणा रंदिन कचाग—
सूरज कि स्यूंद मा,
नीला अगास मा लगै देंदन
खून का दाग. 

राक्षस आँखा घुर्याणा छन,
राक्षसी फंसाणऽ कि योजना का जाळ बुणणी छन,
पागल कुकुरूं तैं यु बड़ा-बड़ा हडगा चुसाणा छन
अर मनख्यूं पर छुल्याणा छन,
यु खुला आम प्रकृति का नियम-कानूनूं तैं
नंगु नाच दिखाणा छन,
मनख्यूं तैं डराणा, गलत फैदा उठणा छन,
अर अपणु साम्राज्य बढ़ांदा हि जाणा छन. 

अछ्यणऽ मा राखी बंसुलऽ नऽ
कटणू छ अंध्यरु कुट-कुट
मनखि कि कुंगळि अंगुळ्यूं तैं,
हर्बि लछणू छ, हर्बि रंदा चलाणू छ
हर्बि अपणा अंगुळौं नऽ नपणू छ
कुंगळि ल्वेखाळ अंगुळ्यूं तैं,  
अर खच्च चलै दीणू छ बंसलु,  
अब इंचटेप नऽ नपणू छ
अधकटि अंगुळ्यूं तैं अंध्यरु.
खूनऽ नऽ लतपत अंध्यरा हाथ देखि कि
डैर जांद उज्यळु,
उज्यळु अंध्यरा हाथ रुकुण चाणू छ,
अर क्वी अंध्यरा तैं अंध्यरा कूणा लुकाणू छ. 

आदिकाल भटी नि छोड़ सकणू अंध्यरु
मनखि कु दगड़ु,
शायद छोड़ बि नि सकद,
अगर अभि बि नि कटे जाला येका काळा फंकूड़
तऽ कई स्वाणा सुपन्या, निर्दोष सुपन्या
कुर्चेणा हि राला,
आधुनिक समाज मा अन्याय सैणा हि राला. 

उज्यळा तैं पिछनै किलै ठिलेणू ह्वालु?
अंध्यरा तैं उज्यळऽ नऽ किलै नि चमकये जाणू ह्वालु?
पिडा़ का कांडा किलै नि गडेणा ह्वाला?
सुंदर फूल अंध्यरा ताळ कब तक कुर्च्याला?
क्वी किलै नि कैर सकणू होलु सांसु?
कब तक बौगणा, सुखणा राला निर्दोष आंसु?
कब तक होणू रालु पांडवूं पर अत्याचार?
मनख्यात मनाणी रालि कब तक हार?
चुप्पी त तुड़ण हि पड़लि!
दिखण हि पड़लु सभ्यूं तैं
एक हि चश्मा नऽ.

Copyright © सतीश रावत
15/05/2020

Comments

जीवन कु सच यु च कभि उज्यळु कभि अंध्यरु
भौत अच्छि प्रस्तुति
Satish Rawat said…
आपक भौत-भौत धन्यवाद.

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