पुस्तक परिचय, कविता संग्रै - "ढांगा से साक्षात्कार", कवि—श्री नेत्र सिंह असवाल



पुस्तक परिचय 


काव्य पोथि (कविता संग्रै)—ढांगा से साक्षात्कार
कवि—श्री नेत्र सिंह असवाल 



श्री नेत्र सिंह असवाल कि काव्य पोथि (कविता संग्रै) "ढांगा से साक्षात्कार" फरवरी 1988 मा दिल्ली मा गढ़वाल़ी साहित्य की प्रमुख संस्था 'गढ़भारती' द्वारा प्रकाशित ह्वा.  ये गढ़वाळि काव्य संग्रह मा 7 गीत, 9 ग़ज़ल अर 12 कविता छन.  यीं पुस्तक की भूमिका राजेंद्र धस्माना जी कि लिखीं छ. 

कवि तैं अपणि जन्मभूमि से भौत प्यार छ.  वु पहाड़ूं कि पिड़ा पछ्यणदा छन. वु लिखदन—
"मुंडनिखोलू करिगीं बगतल्, ऊ भगत त्यरा तरि गईं
जौंकि दुय्या जगा टंगड़ी, ऊँकि अकला़कण्ड जी।"


पलायन का कारण पहाड़ की दशा पर कवि चिंतित छन, जौं का बाना इतगा दुख-दर्द सैन वु लोग प्रवासी ह्वे गेन.  कवि लिखदन—
"गीत प्रवासी ह्वे गैन
उकली़ लग बँसुली़ !
जौं गीतु का बानऽ थमली़ खाया
जिकुड़ी पर सैं, नौ-नौ दूँला़
जाज का पंछी ऊ, आला कभि न कभीऽऽऽ
रो न चुचि पगली!
उकली़ लग बँसुली़!"


पहाड़ कु पाणि बौगि जांद, पहाड़ का काम नि आंद.  पहाड़ का लोग पाणि खुण तरस जंदिन अर खेती तैं बरखा पर निर्भर रैण पड़द.  कवि का शब्दूं मा—
"सरगै जलुड़ी घाम लगीं छ
बरखा की गिंडका उँद फाँस खयीं छ
चोलि़ परणि की कुगति हुईं ! चिठि आई गाँव बिटी"


बेरोजगारी अर मैंगै से आम आदमी की ब्यथा का बारा मा मा कवि लिखदन—
"बेरोजगारी कू भैरौं, रांकु बालीs
धुरपली़ हलाँदा
मैंगै कू डौंड्या पकाँद खिंचड़ी
हमरि ख्वपरि मा माई !"


जनता  कु चुन्यू नायक अपणि जनता कि परवाह नि करद सिर्फ अपणि सुचद—
"तुम त छ्वारो, फग्गल सूँघा
मिल लबला़णा सोली!"


कवि समाज मा व्याप्त बुरयूं से दुखी छन, जलन की भावना पर उ लिखदन—
"झमबल, भूखी-नंगी दुन्या रीस करदा
खांदा-कमांदा कै देखि सकदा । झम !"


जु अपणु उत्तरदायित्व ठीक ढंग से नि निभाणू छ, अपणा अधिकारूं कु गलत प्रयोग करणू छ, लोग वे तैं देखी चुप रंदन अर दुनिया मा जैकु क्वी नी छ, जु अपणि पुटगि पळणा वास्ता ईमानदारी अर मेहनत से काम करद लोग वे तैं जीण नि देंदा—
"उज्याड़ बाड़ खाँद, चुप द्यखदा रँदीं लोग
निगुसैं का ढांगा थै, कच्याँद रँदीं लोग।"


पहाड़ की अर्थव्यवस्था मनीऑर्डर पर ज्यादा निर्भर रैंद कवि का शब्द मा द्याखा—
"ये मैना नि भेजि साकु खर्च त्वे खुणै
रिंग-रिटोलि़ रात-दिन, क्या बुथ्यौण त्वे ।"


कवि लिखणा छन कि क्वी भि काम धैर्य अर सही ढंग से करण चयेंद तभी कामयाबी मिलद—
"भलु मिसैकि छाँदो
त, तर्र इन नि चूँदो"


समाज मा बुरै  फैलदा जाणी छन, यु मनखि अच्छि तरां जणद.  मनखि अबु से अफी नाराज छ—
"जिंदगी बड़ी बदतमीज ह्वेगे,  दादा 
अफु थैं अफ्वी सिंगाण ल्हैगे, दादा !"


जनता कु चुन्यूं नायक कन अपणु रंग बदल देंद, वु अफु तैं भगवान से कम नि मनदु—
"मेरि टंगड़ी पर सरु असमान, टिटरी टिट ! 
मूड़ मीं छौं, ऐंच वी भगवान, टिटरी टिट !"


कवि अपणा देशा हर नागरिक तैं मेहनत का फलस्वरूप सक्षम अर सफल दिखण चांद—
"मि चाँदु—
कि म्यारा देशौ हर व्यक्ति कवि ह्वा 
अर, हर कव्या कांधम् हैळ ह्वा" 


कवि वूं पर व्यंग्य करदन जु समाज मा व्याप्त बुरयूं तैं खतम करणै नि सुचणा छन, जु विकास कि बात नि करणा छन—
"नमस्कार ऊँ खूण 
जु आँखा बूजीऽ
चट्टेली, हुँगरा दीण पर मिस्याँँ छन
ज्ञानौ राजपथ पतेड़णा छन ।" 


विकास की असमानता से कवि-मन तैं ठेस पौंछद—
"कुछ लोग 
कचब्बळि खा-पे 
जूँगा मलसणा छन !"
*  *  *  *  *  *  *
"कुछ आदिम जूनि छोडिकि 
शुक्र-शनि पर दाँत पल्याणा छन"
*  *  *  *  *  *  *
"जु रोज अपणा हडका 
उरख्यलळ उँद कुटदा 
फिर भी 
हैंकि बेली़ऽ फिकर 
रोज वीं कि देलि़म्
भूकु कुकुर-सि क्वींकाण बैठ जाँद नप्प !" 


झूटि शान दिखै कि क्य फैदा—
"अन्नल/भितर ड्वारा-भाँडा भ्वरयां छन बल 
फिर भी हैंसण-ख्यलणै उमर 
बूँणा भाँडा मुज्याँद !" 


क्रांति अचानक प्रकट नि होंद.  यां खुण भौत तपस्या करण पड़द, भौत बलिदान देण पड़द—
"जण्दु छै !
क्रांति थै जन्म दीणा खुण
*  *  *  *  *  *  *
छवळण प्वड़दीं—समोदर-क-समोदर" 


समाज मा अनेक तरां का लोग रंदन, हम तैं कैका भकळौण मा नि जैकि अपणा विवेक से वूंकु मूल्यांकन करण चयेंद—
"भुला,
यूँ थैं पछ्यण्णू जरूरी छ 
इ हमरीऽ दूदै कट्वरि का सैंत्या-पल्याँ गुराउ छन ।" 


क्य हम इतगा सशक्त नि छांं कि अपणि लड़ै अफी लैड़ सक्वां?  जु हमरा बान लड़णा छन, वु हमरा अधिकारूं कि रक्षा बान न, बल्कि अपणा फैदा बान लड़णा छन—
"हम जणदा छां—
कि य हमरि 
अर सिर्फ हमरि ही छ लड़ाँ 
जैं थै क्वी और ही 
ख्यलणा छन मैच की तराँ !" 


पहाड़ का रंग मा रंगी चार लैनूं कि शृंगार रस से परिपूर्ण शानदार कविता "आँखि-3" का भाव अर बिम्ब दिखण लैक छन.  कवि लिखदन—
"हेरि तिल् 
दड़बड़ी आँख्यूल् 
बरस्वाऽ बाँजा सेरों मां - 
पैटि गे कूल !" 


भाषा का दृष्टिकोण से कवि कि भाषा सरल अर सहज छ, कखि-कखि मा पुरणा इना शब्दूं कु प्रयोग हुयूं छ, जु अब आम बोलचाल कि भाषा मा सुणणा मा कम अंदिन.  कवि अंग्रेजी अर हिन्दी शब्दूं कु प्रयोग करण मा भि प्रवीण छन.  यु शब्द गढ़वाली भाषा दगड़ आसानी से घुल-मिल गेन. 

अलंकारूं मा पुनरुक्ति, उपमा अर उत्प्रेक्षा अलंकार कवि तैं ज्यादा पसंद छन. 

काव्य मा बिम्ब अर प्रतीकूं कु सुंदर प्रयोग हुयूं छ. 

लेख : सतीश रावत 
Copyright © सतीश रावत 
20/05/2020


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