पहाड़ छूणा छन आसमान (गढ़वळि कविता)
पहाड़ छूणा छन आसमान
पहाड़ छूणा छन आसमान
अर पहाड़ूं कऽ चुप्फौं पर घैंट्या छन
बिजलि कऽ टावर दैत्याकार
बंध्या छन एक-दुसरा से म्वाटा-म्वाटा तारूं नऽ
तारूं कऽ पुटुग बौगणा छन आंसु
दिखेणा छन खालि गौं लगातार
मथि खबेस-सि ऐडा़णा छन यु ताकतवर तार
ताळ बौगणा छन एक ही रंग का दुन्या भरा सुपन्या
काजोळ पाणि मा ज्यूंदा सुपन्या आपस मा टकराणा छन
अर दूर छिटगे जाणा छन
मुर्यां सुपन्या कोशिश करणा छन
बिजलि कऽ तारूं कऽ पुटुग बौगदा आंसू तैं फुंजणऽ कि
पर आंसु ज्यूंदा सुपन्यों तैं खुज्याणा छन
अर ज्यूंदा सुपन्या टकराण से फुरसत हि नि पाणा छन
भौत लंबु सफर तय करियाल बिजलि कऽ तारूं न
उचि-निसि अर सैंणि सैरि दुनिया देख्याल
अब पहाड़ कऽ खुटौं मा ऐ गेन बिजलि कऽ टावर
अर पहाड़ अभि बि छूणा छन आसमान.
Copyright © सतीश रावत
10/05/2020

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