गढ़वळि कविता, -1-, हैंसु या रूँ, सतीश रावत, 07/01/2003


हैंसु या रूँ

त्यारा जन्म पर
मि हैंसु या रूँ ?
मि खुश हूँ या दुखी ?
मि समझ नि सकणू छौं
हे बाळा, छुटा छौंना !
किलै हँसणी छै ?
किलै गाणी छै ?
किलै नचणी छै ?
तिन क्या जणण
जु हाथ त्वेथै इत्गा प्यार करणा छन ;
वूँन त्वे थै
खूब संतण-पळण ,
खूब खलाण-पिलाण
अर खूब प्यार भि करऽण
पर , तिन वूँकु प्यार नि समऽझ सकण,
अर एक दिन ऊँई हाथूँन
त्यारू ल्वेबुळ चखण.

Copyright © सतीश रावत
07/01/2003








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