गढ़वळि कविता, -57-, छपछऽपि फटऽळि, सतीश रावत, 13/01/2019
-57-
छपछऽपि फटऽळि
ढक्यां दरवजौंऽ भितऽर रैंदु छ अभि बि क्वी
यु "क्वी" क्वी भि ह्वे सकऽद
शायद सुपन्या, खुद या अंध्यऽरु
अर भौत कुछ और भि ह्वे सकऽद
जु गुड़्यूं छ वर्षूं भटी
यूं ऊबऽरा-पांडौ मा
फांस खंया-सि सुपन्या लटक्यां छन दरवजौं पर
यूं सुपन्यों कि चाबि
हर्चि गेन चाब्यूं कि दुनिया मा
यु "क्वी" आण चाणा छन भैर
दिखऽण चाणा छन—
चाँदीऽ डांडि-कांठ्यूं मा
सूनाऽ सूरजौऽ आण
बच्याण चाणा छन—
गोर-बछरौं, चखुला-पुतळौं, फूल-डाळ्यूं दगऽड़
नयेण चाणा छन—
कौंपदा गाड-गदनौं, छुंया, धारा-पंदेरौं का तौळ
चौकाऽ तीर बैठीऽ तपण चाणा छन घाम
जीण चाणा छन घामौऽ अछ्यांण
खिलऽण चाणा छन रुमुक दगऽड़
पीण चाणा छन जून-गैंणौं कु रूप
पर यूंका दगड़्या यु ढक्यां दरवजा मजबूर छन
यु बिंंगदा त सब छन
पर यूं मा क्वी हलचल नि होंदि
यु देख सकदन भितऽर अर भैर भि
यु दरवऽजा जु दिखेणा छन अवरोधक
वास्तव मा यु ही त करंदन भैर अर भितरौ मेल
भैरै पाळि भितऽर तैं जीण सिखांद
अर भितऽरै पाळि दुःख-दर्द भैर लांद
पर य पिड़ा कैतैं नि दिख्यांद
झूरि लगीऽ कतगै कड़ि-द्वार टुट गेन
कई पाल पोड गेन
कई सुपन्या, खुद अर अंध्यऽरा
दबे गेन खंद्वारूं पुटुग
कई घौरूं कि धुरपळ्यूं मा
अभि बि चमकऽणी छन छपछऽपि फटऽळि.
Copyright © सतीश रावत
13/01/2019
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