गढ़वळि कविता, -60-, दिल अर दिमाग, सतीश रावत, 28/12/2019
-60-
दिल अर दिमाग
दिल तैं दिखेणू छ -
सूरज पूरव भटी आँदा
अर पश्चिम मा समाँदा.
दिल तैं दिखेणा छन -
कैकि खोज मा
कुंगळा अगास मा डबख-डबखी
जून कि खुट्यूँ मा पुड्याँ छाळा.
दिल तैं दिखेणू छ -
तपदा रेगिस्तान मा दूर पाणि.
दिल तैं वु सब कुछ दिखेणू छ -
जु शायद छैंं ही नी छ
य वाँ तैं सिर्फ दिल ही देख सकद.
आँखि हर्बि उंगणी छन
अर हर्बि पुर्याणी छन हुंगरा;
कंदूड़ूँ पुटुग रुवाँ गुंडा डाळि कि
फसोरी सियूँ छ दिमाग.
Copyright © सतीश रावत
28/12/2019
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