गढ़वळि कविता, -39-, नयु दिन
-39-
नयु दिन
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बिनसरि
होंद
रात बिजि जाँद
सुबेर उठि जाँद
चखुलि च्वींच्याँद
घाम आँद
बाछि रमऽद
गौड़ि गुस्याँण खुज्याँद
ताँबै गागर चमकि जाँद
चुला मा चा उमळणी राँद
मिठि-मिठि धै सुण्याँद
स्कूलै घंटि बुलाणी राँद
पुँगड़ौं मा दगड़्या छ्वीं लगाँद
बेटि-ब्वारि घास-लखड़ु लाँद
ढबऽड़ि रूठीऽ खुशबु आँद
इस्कुल्या नौना-बाळौं कि खुशी सुण्याँद
खेल नौना-बाळौं दगड़ खिलणू राँद
चकुंडै डाळि उंगण बैठ जाँद
सुरुक-सुरुक रुमुक आँद
फूल-फटकी जून आँद
गैणौं दगऽड़ खिलणी राँद
हँसदा-हँसदा रात से जाँद
नयु दिन बाटु जग्वळणू राँद
नयु मौका दीण चाँद.
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© सतीश रावत
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